क्या हमारा समाज समलैंगिकता को स्वीकार करने को तैयार है

सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देकर धारा 377 को खत्म कर दिया है। इसी के साथ अब भारत में समलैंगिकता अपराध की श्रेणी से बाहर हो गया है। अब एलबीजीटीआईक्यू (LBGTIQ) के लोग आजाद है प्यार करने के लिए, अपने पसंद से अपना पार्टनर चुनने के लिए, बेधड़क दुनिया को अपनी पहचान बताने के लिए लेकिन क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हमारा समाज इन्हें अपनाने के लिए तैयार है।

क्या है LBGTIQ

जेंडर की शब्दावली पहले बहुत ही आसान थी F और M यानी फीमेल (स्त्री) और मेल ( पुरूष) और ये दोनों एक दूसरे पर आकर्षित होते हैं लेकिन अब ये शब्दावली थोड़ी कठिन हो गई हैं। अब इसमें LBGTIQ  भी आ गए हैं। L से लेस्बियन। लेस्बियन वो लड़कियां होती है, जो पुरूष की तरफ नहीं बल्कि महिलाओं की तरफ आकर्षित होती है। B से बायोसेक्सुएल, इनमें वो लोग शामिल होते हैं जो स्त्री और पुरूष दोनों में आकर्षित होते हैं और दोनों के साथ संबंध बनाते है। G का अर्थ है गे यानी कि वो पुरूष जो स्त्री पर नहीं बल्कि एक पुरूष पर ही आकर्षित होते हैं और उनसे ही प्रेम संबंध स्थापित करते है। T यानी ट्रांसजेंड़र, जिन्हें थर्ड जेंडर भी कहा जाता है। इसमें जब बच्चा पैदा होता है तो लड़के के रुप में पैदा होता है लेकिन जैसे – जैसे वह बड़ा होता है, खुद को लड़की की तरह पाता है। इसे कहते हैं ट्रांसवूमन और अगर इसका उलट हो जाए तो वह कहलाएगा ट्रांसमेन। कुछ ट्रांसजेंड़र अपने हार्मोन के साथ अपने शरीर को ढ़लाने के लिए सर्जरी का इस्तेमाल करते हैं और कुछ सिर्फ पहनावा बदल देते हैं। ये लोग किसी पर भी आकर्षित हो सकते है।

आई (I) यानी इंटर सेक्स को भी ट्रांसजेंडर का हिस्सा माना जाता है। इंटर सेक्स वाले बच्चे जब पैदा होते हैं तो उस वक्त उनके जननांग से साफ नहीं होता है कि वह लड़का है या लड़की। उस वक्त डॉक्टर को जो सही लगता है, वह उस बच्चे को उसी लिंग का मान लिया जाता है और उसे ऐसे ही बड़ा किया जाता है लेकिन बड़े होने के बाद ऐसे व्यक्ति खुद को स्त्री – पुरूष या ट्रांसजेंड़र कुछ भी मान सकते हैं और आखिर में क्यू (Q) यानी क्वीर, समलैंगिगता के पूरे समुदाय को क्वीर कहा जाता है।

 धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 शुरू से ही विवादों में रही। यह धारा ब्रिटिश काल में बनी थी, जिसके अंतर्गत अगर समान लिंग के कोई भी दो लोग आपस में संबंध बनाते हैं तो उसे अपराध की श्रेणी में रखा जाता था। इसके मुताबिक कोई भी प्रकृति की व्यवस्था के विपरीत किसी स्त्री, पुरूष या जानवर के साथ यौनाचार करता है तो उसे 10 साल की कैद और जुर्माने की सजा हो सकती है।

साल 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने ‘नाज फाउंडेशन’ के एक केस में इसे गलत करार दिया था लेकिन 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बदलते हुए रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एलजीबीटी से जुड़े इस मद्दे को संसद द्वारा निपटाया जाना चाहिए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ कई समीक्षा याचिकाएं दायर की गईं, जिन्हें बाद में रिट याचिकाओं में तब्दील कर दिया गया और मामला संविधान पीठ को सौंप दिया गया था।

अब संविधान पीठ के पांच जजों  मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने धारा 377 पर फैसला सुनाते हुए इसे रद्द कर दिया है। अब भारत में समलैंगिग होना अपराध नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और जस्टिस एएम खानविल्कर ने कहा कि समान लिंग वाले लोगों के बीच रिश्ता बनाना अब धारा 377 के तहत नहीं आएगा। बेंच ने माना कि समलैंगिकता अब अपराध नहीं है। लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी। समलैंगिक लोगों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है। जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि मैं जो हूं वो हूं।  लिहाजा जैसा मैं हूं उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाए।

यहां ये बात ध्यान रखने वाली है कि सुप्रीम कोर्ट ने दो बालिग लोगों के बीच संबंध बनाने को अपराध की श्रेणी से हटाया है, ना कि पूरी 377 की धारा रद्द की है। अर्थात यदि अभी भी संबंधो  में असहमति हुई या जबरदस्ती हुई तो सजा धारा 377 के तहत ही मिलेगी। बच्चों और जानवरों के साथ संबंध बनाना अभी भी धारा 377 के तहत अपराध है।

समलैंगिकता पर क्या कहता है धर्म

समलैंगिगता को लेकर समाज दो वर्गों में बंट हुआ है, एक वो लोग जो इन्हें सहज स्वीकार करते हैं और दूसरा बड़ा समुदाय वह है, जो समलैंगिगता को अनैतिक, अप्राकृतिक और धर्म के खिलाफ बता रहे हैं। ये लोग सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का भी विरोध कर रहे हैं। लेकिन सोशल मीडिया से अधकचरा ज्ञान प्राप्त करने वाले लोग यदि धर्म की किताबों में जाकर देखें तो हिन्दु धर्म में समलैंगिकता को गलत नहीं माना गया है। हिन्दु धर्म शुरू से ही खुले विचारों का रहा है। खुजराहो और ओडिशा के मंदिरो में उकेरी गई मूर्तियों में हिन्दु धर्म की खुली सोच का वर्णन मिलता है। इसके अलावा भगवान शिव का एक रूप अर्धनारीश्वर वाला है, जिसे आज की शब्दावली में एंड्रोजीनस सैक्सुअलिटी कहा जाता है। मिथकीय आख्यान में विष्णु भगवान मोहिनी रूप धारण कर शिव को रिझाते हैं, जोकि अनाचार नहीं लगता है। इसके अलावा महाभारत में अर्जुन ने बृहन्नला का रुप धरा था और शिखंडी का लिंग परिवर्तन संभवत: सेक्स रिअसाइनमेंट का पहला उदाहरण है।

समलैंगिकता सिर्फ यहुदी, ईसाई और इस्लाम धर्म में वर्जित रही है। युनान और रोम में इस संबंध को सहज स्वीकृति मिली है। ईसाई धर्म में भी समलैंगिगता को लेकर अलग – अलग मान्यताएं है। रोमन कैथोलिग चर्चों के अनुसार यह विकृति हैं लेकिन ऑर्थोडॉक्स चर्चों ने समलैंगिगता की स्वागत की बात कही है।

वैज्ञानिक भी मानते हैं कि समलैंगिकता कोई बीमारी या मानसिक विकृति नहीं है और ना ही इसे अप्राकृतिक कहा जा सकता है।

क्या हमारा समाज समलैंगिकता को स्वीकार कर पाएगा

सुप्रीम कोर्ट ने तो फैसला सुना दिया लेकिन क्या हमारा समाज इतनी आसानी से समलैंगिकता को स्वीकार कर पाएगा। शायद नहीं… समलैंगिग समुदाय ने सिर्फ कानूनी लड़ाई जीती है। समाज के साथ उनका संघर्ष अभी भी जारी है। हमारा समाज आज भी यह स्वीकार नहीं करेगा कि समलैंगिग लोग उनके आस – पास क्यों है। इस कानून से सिर्फ इतना अंतर आया है कि पहले यदि किसी को इन संबंधों से परेशानी होती थी तो वह शिकायत दर्ज करा सकता था और कार्यवाही होती थी। अब ना शिकायत दर्ज होगी और ना ही कोई कार्यवाही होगी लेकिन अभी भी एक लड़का  दूसरे लड़के के हाथों में हाथ ड़ालकर सड़कों पर घूमने से हिचकिचाएगा, अभी भी मां – बाप दो लड़कियों को गले लगते देखकर अपने बच्चों की आंखे बंद कर देगें।

समाज किसी भी चीज को इतनी आसानी से नहीं अपनाता है। यदि लोग समलैंगिकता को स्वीकार कर पाते तो सालों से किन्नर समुदाय के लोग सड़क पर भीख मांगते या घर पर नेक मांगते नजर नहीं आते। समाज की अस्वीकरता ने आज किन्नरों को ऐसा बना दिया है कि वह शादी – ब्याह या बच्चे होने पर डरा – धमकाकर पैसे लुटते हैं। यदि समाज पहले से ही किन्नरों को अपना लेता तो शायद वो भी पढ़ – लिखकर नौकरी करते। आत्मसम्मान से जीते।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एक उम्मीद जगी हैं कि शायद अब समाज भी इन लोगों को सहज स्वीकार किया जाएगा और समाज स्वीकार ना भी करें तो कम से कम ये लोग कानूनन अपनी पहचान के साथ जीने के लिए आजाद हो गए है।

 

 

 

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