आखिर कब मिलेगी महिलाओं को इन क्रूर प्रथाओं से आजादी

 

मुस्लिम महिलाओं का शोषण करती ये परंपराएं

बरसों से मर्दों ने औरतों को परंपराओं, रिवाजों के नाम पर जकड़ रखा है। इन्हीं रिवाजों का हवाला देकर औरतों का शोषण किया जाता है और ये शोषण सिर्फ शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक और भावनात्मक रुप से भी किया जाता है। शरीर के जख्म तो फिर भी भर जाते हैं लेकिन एक औरत की भावनाओं को कुचलकर उसे रौंद देना, कितना तकलीफदेह होता है। ये एक मर्दे कभी नही समझ पाएगा… खासकर कि वो मर्द जो औरत से ज्यादा अपने धर्म और परंपराओ को मानता हो। जो औरत को सिवाय एक जिस्म के कुछ नहीं समझता हो, लेकिन अब वक्त बदलने लगा है। अब महिलाएं खुद पर हुए अत्याचार को सहने के लिए तैयार नहीं है। ना ही धर्म के नाम पर और ना ही परंपराओं के नाम पर।

अब तीन तलाक को ही देख लीजिए। बरसों से महिलाएं इस अत्याचार को सहन कर रही थी लेकिन पिछले कुछ सालों से इसी तीन तलाक के खिलाफ लड़ रही है। काफी हद तक मुस्लिम महिलाओं को इस मामले में जीत भी मिल गई है लेकिन ये तो सिर्फ शुरूवात है अभी मुस्लिम महिलाओं को इससे भी बड़ी लड़ाईयां लड़नी है ताकि उनकी आने वाली बेटियां बेहतर जिंदगी जी सकें, ताकि भविष्य में किसी और मुस्लिम महिलाओं के साथ तीन तलाक, हलाला, खतना, मिताह, मुस्याह आदि परंपराओं के नाम पर शोषण ना हो।

तीन तलाक पर भले ही बैन लग गया हो लेकिन अभी भी कुछ और परंपराएं ऐसी हैं, जिन्हें बैन करने की जरूरत है। क्योंकि इन्हीं परंपराओं के नाम पर एक मर्द अपने ही घर की महिलाओं पर जुल्म ढ़ाता है। परंपराओं को हवाला देकर औरत को हाड़ – मांस का पुतला समझा जाता है और जो जिसके मन में आता है, बस किए जाता है। कभी किसी औरत को नहीं पूछा जाता है कि वह क्या चाहती है, कम से कम एक औरत को इतना अधिकार तो होना चाहिए कि वह अपने शरीर से जुड़े फैसले ले सके।

मुस्लिम धर्म में तीन तलाक के अलावा कई ऐसे नियम – कायदे हैं, जिनमें औरतों का बेहद दर्दनाक प्रक्रिया से गुजरना होता है। उनमें से एक है खतना….

 क्या है खतना

मुस्लिम धर्म के एक छोटे से संप्रदाय बोहरा में महिलाओं का खतना किया जाता है। इसे धार्मिक कारणों से किया जाता है। खतने में लड़की की योनी या जननांग की ऊपरी परत (क्लिटोरिस) को ब्लेड़ से काट दिया जाता है। यह छोटी बच्चियों के साथ किया जाता है। बच्चियों के शरीर का एक हिस्सा बिना सुन्न किए काट दिया जाता है। हैरानी कि बात ये हैं कि बच्चियों का खतना उन्हीं की दादी, नानी या अम्मी करती है। यह क्रूर परंपरा कुछ देशों में बैन है लेकिन भारत पाकिस्तान सहित अभी भी कई देशों में यह परंपरा प्रचलित है। खतना करने के पीछे का उद्देश्य भी बेहद शर्मनाक है। माना जाता है कि खतना की हुई महिलाएं अपने पति के प्रति ज्यादा वफादार होती हैं, क्योंकि खतना करने से महिलाओं की यौन इच्छाएं कम हो जाती है। कुल मिलाकर इस समाज की सोच है कि महिलाओं को सेक्स का आनंद लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए। हालांकि अब बोहरा समाज की कुछ महिलाओं ने इस क्रूर प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई है और इस पर बैन लगाने के लिए याचिका दायर की है।

हलाला

हलाला भी मुस्लिम महिलाओं के लिए एक अभिशाप है। कई बार पति बिना सोचे – समझे अपनी पत्नी को तीन तलाक दे देता है लेकिन बाद में उसे अपनी गलती का अहसास होता है और वह फिर से अपनी पत्नी के साथ निकाह करना चाहता है लेकिन इसके लिए उसकी पत्नी को एक दर्दनाक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। जिसे हलाला कहा जाता है। दरअसल महिला को फिर से अपने पति से निकाह करने के लिए पहले किसी दूसरे आदमी से निकाह करना होगा। उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने होगें, फिर माहवारी यानी पीरियड्स हो जाए तो वह उस आदमी को तलाक देकर दोबारा अपने पति से शादी कर सकती है। इतना ही नहीं मौलवियों ने हलाला को अपना धंधा बना दिया। मौलवी पैसे लेकर ऐसी महिलाओं से शादी करते हैं, संबंध बनाते हैं और फिर तलाक दे देते है। अपने पति को दोबारा वापस पाने के लिए एक महिला को किसी अनजान शख्स के साथ सोना होता है, जो किसी रेप से कम नहीं होता है। तीन तलाक पर बैन लगने के बाद उम्मीद है कि हलाला जैसी घटिया प्रथा भी बंद हो जाएगी।

बहूविवाह

भारत में मुस्लिम धर्म को छोड़कर बाकी सभी धर्मों में बहुविवाह करना कानूनन अपराध है। इसाई धर्म में ‘क्रिस्चियन मैरिज एक्ट-1872’ के तहत, ‘पारसी मैरिज एक्ट-1963’ और ‘हिन्दू मैरिज एक्ट-1955’ के अनुसार हिन्दू, सिख, बौद्ध और जैन धर्म के लोगों के लिए बहुविवाह एक अपराध है। इन धर्मों या समुदाय के आदमी बिना तलाक लिए एक से ज्यादा शादी करते हैं तो उन्हें भारतीय दंड़ सहिंता 494 के तहत सात साल की सजा हो सकती है, लेकिन मुस्लिम पुरूषों पर 494 धारा लागू नहीं होती क्योंकि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मुस्लिम धर्म में बहुविवाह अपराध नहीं है साथ ही भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 में धार्मिक अधिकारों की स्वतंत्रता है। इसी के चलते किसी भी धर्म के व्यक्ति को अपने धार्मिक रीति – रिवाजों और परंपराओं को मनाने की छूट मिलती है।

 मुताह निकाह

मुताह का शाब्दिक अर्थ होता है आंनद या मजा। मुताह निकाह एक तरह का कॉन्ट्रेक्ट होता है। जिसमें किसी औरत से एक तयशुदा समय के लिए निकाह किया जाता है, जिसमें मेहर की एक मोटी रकम दे दी जाती है। ये शादी तीन दिन से लेकर कई हफ्तों के लिए हो सकती है। दरअसल मुस्लिम धर्म में वेश्यावृत्ति को हराम माना जाता है। जिस्म खरीदने और बेचना बुरा माना जाता है, ऐसे में मर्दों ने अपनी शारीरिक संतुष्टि के लिए इस कुप्रथा को जन्म दिया। जिसमें आदमी एक महिला से कुछ दिनों के लिए शादी करता है।

गौर करने वाली बात है कि ऐसी शादी के लिए भी औरत को ये शर्ते पूरी करना होती है….

  1. लड़की पवित्र हो यानि वर्जिन हो।
  2. नाबालिक ना हो।
  3. लड़की का मुस्लिम होना अनिवार्य है।
  4. व्याभिचार में लिप्त ना हो।

हां, आदमी किसी भी उम्र का हो सकता है, शादीशुदा, अधेड़ कैसा भी चलेगा।

मिस्यार निकाह

मुताह निकाह शिया मुसलमानों में प्रचलित है और सुन्नी मुस्लमान मुताह निकाह को बिलकुल पसंद नहीं करते हैं। इसलिए वह मिस्यार निकाह करते हैं। मिस्यार निकाह को आसान भाषा में समझें तो इसे लिव इन रिलेशनशिप का अल्ट्रा मॉर्डन संस्करण कह सकते हैं। इस निकाह में पति – पत्नी अलग – अलग रह सकते हैं। यह निकाह भी सिर्फ शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाता है। इसमें पत्नी पति की संपत्ति पर हक नहीं रख सकती हैं और पति पत्नी से घर के काम करने को मजबूर नहीं कर सकता है। लेकिन इसमें भी वहीं दिक्कतें हैं जो मिताह निकाह में है। ऐसे निकाह को खत्म करने के बाद आदमी तो आसानी से मूव ऑन कर जाता है लेकिन ऐसी औरतों को समाज नहीं अपनाता है। इस बीच अगर महिला का कोई बच्चा पैदा हो गया तो वह भी नाजायज ही कहलाता है और आदमी पर उस बच्चे को पालने की जिम्मेदारी भी नहीं होती है। कुल मिलाकर ये प्रथाएं मर्दों की शारीरिक जरूरतों को पूरा करने के लिए हैं, जिनमें औरतों को  मात्र एक जिस्म के अलावा कुछ नहीं समझा जाता है।

अब सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं में निकाह हलाला, मुताह मिस्यार जैसे कृत्य को संविधान के बुनियादी अधिकार वाले अनुच्छेद में समानता के अधिकार का उल्लंघन बताते हुए इन्हें असंवैधानिक करार देने की मांग की है। उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इसमें दखल देकर ऐसी कुप्रथाओं से मुस्लिम औरतों को आजाद कराएगा। ये गैर जरूरी प्रथाएं जितनी जल्दी खत्म होंगी उतना ही मुस्लिम कौम के लिए बेहतर है। वैसे सच्चाई ये भी है कि अगर न्यायव्यस्था ने न्याय किया भी तो महिलाओं को सिर्फ कोर्ट जाने का दरवाजा खुल जाएगा, ऐसी कुप्रथाएं को जड़ से खत्म करने के लिए मुस्लिम महिलाओं को ही संगठित होकर पुरूषवादी समाज से लड़ना होगा। इन औरतों को मर्दों को बताना होगा कि वह सिर्फ हाड़ – मांस का एक पुतला नहीं बल्कि एक जीती – जागती इंसान है। जिनमें भावनाएं होती है। जो अपने जिस्म के अलावा भी बहुत कुछ हैं। जो आसमान छूना चाहती हैं। जो सपने देखना चाहती हैं। जो अपने शरीर और जिंदगी से जुड़े फैसले खुद करना चाहती है। जो तीन तलाक, हलाला, खतना, मिताह निकाह जैसी क्रूर प्रथाओं से आजादी पाना चाहती हैं। जब तक महिलाएं खुद अपने लिए नहीं लड़ेंगी, तब तक कोई भी उन्हें न्याय नहीं दिला पाएगा।

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