बेटियों ने किया पिता का अंतिम संस्कार तो पंचायत ने सुना दिया फरमान

हमारे देश में औरतों पर हर बात के लिए रोका – टोकी की जाती है। कभी मंदिर मत जाओ, कभी स्कूल मत जाओ, कभी खेलने मत जाओ, यहां तक कि श्मशान को भी आदमी अपनी जागीर समझता है और औरतों को श्मशान जाने पर पाबंदी लगाई गई है लेकिन ये 21वीं शताब्दी की औरतें हैं। जब अपना हक लेने पर उतरती हैं तो सीना ठोक कर समाज को चुनौती देती है।

ऐसी ही चुनौती राजस्थान के चार बेटियों ने समाज के उन ठेकेदारों को दी, जो उन्हें अपने पिता की अंतिम इच्छा पूरी करने से रोक रहे थे।

द लल्लनटॉप न्यूज बेवसाइड़ पर पोस्ट एक खबर के मुताबिक राजस्थान की रहने वाली चार बहनों ने अपने पिता की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए उनका अंतिम संस्कार किया लेकिन समाज के कुछ ठेकेदारों ने पंचायत बिठाकर तुगलगी फरमान सुना दिया।

दरअसल बूंदी शहर के रहने वाले 58 साल के दुर्गा शंकर की 29 जुलाई को निधन हुआ। वह पेशे से अध्यापक थे और उनकी चार बेटियां हैं। वह अक्सर कहते थे कि उनकी अर्थी उनकी चारों बेटियां उठाएंगी। इसलिए बेटियों ने इसे अपने पिता की अंतिम इच्छा मानकर अंतिम संस्कार खुद करने की ठानी लेकिन कुछ लोगों ने इस पर आपत्ती जताई क्योंकि समाज के हिसाब से स्त्रियों के श्मशान घाट जाने पर पाबंदी है। मुखाग्नि देने का हक सिर्फ बेटों को दिया गया है। अगर किसी का बेटा ना हो तो परिवार के अन्य पुरूष अंतिम संस्कार करते हैं।

लेकिन जब इन बेटियों ने अपने पिता की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए इस रुढ़िवादी परंपरा को तोड़ना चाहा तो पंचायत ने फैसला सुनाया कि यदि बेटियों ने पिता का अंतिम संस्कार किया तो गांव का कोई भी व्यक्ति इसमें शामिल नहीं होगा।

लेकिन पंचायत के फैसले को ठेंके पर रखते हुए इन चारों बेटियों ने अकेले ही अपने पिता को मुखाग्नि दी। इसके बाद समाज के ठेकेदारों ने चारों बेटियों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया। इस फैसले से बेटियां दुखी तो हैं लेकिन उन्हें तसल्ली है कि उन्होंने अपने पिता की इच्छा पूरी की।

दुर्गा शंकर की बड़ी बेटी ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा जब हम पिता का अंतिम संस्कार कर वापस आए तो पंच-पटलों ने पंचायत भवन को बंद कर दिया। रिवाज के अनुसार हमें यहीं नहाना होता है लेकिन हमें घर जाकर नहाना पड़ा। पिता की अंतिम इच्छा को पूरा करने पर हमें ऐसे सजा दी गई जैसे हमने कोई गुनाह कर दिया हो।’

बता दें कि  मामला जब प्रशासन के पास पहुंचा तो प्रशासन ने पंच-पटेलों पर कार्रवाई करने के आदेश दिए। जिसके बाद से ही आदेश सुनाने वाले सभी पंच मुहल्ला छोड़कर भाग गए हैं।

इस पूरे मामले में इन चारों बेटियों की हिम्मत की दाद देनी होगी। जिस तरीके से ये बेटियां अकेले रुढ़िवादी परंपरा को तोड़ने के लिए समाज के खिलाफ खड़ी हो गई, वो वाकई काबिलेतारीफ है।

 

 

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